शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

विक्रम संवत 2080 की समस्त भारत वंशियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई। -तिलक युगदर्पण


 

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👑वन्देमातरम्! उज्जैनी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनका साम्राज्य पश्चिम में द.अरब से पूर्व में चीन तक विस्तृत रहा उनके विक्रमी संवत् की समस्त विश्व में फैले भारत वंशियों को युगदर्पण की ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं - तिलक रेलन वरिष्ठ पत्रकार YDMS👑

युगदर्पण: भारत के संविधान में विक्रम संवत् किन्तु सरकारी कैलेंडर में शक संवत
दिल्ली 1 चैत्र विक्रम 2080 (14 अप्रेल 2023)
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विक्रम संवत: "चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य", जो विक्रमसेन के नाम से विख्यात रहे हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप के परमार राजवंश के सम्राट थे| उनके साम्राज्य में भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा भाग सम्मिलित था। जो पश्चिम में वर्तमान सऊदी अरब से लेकर पूर्व में वर्तमान चीन तक फैला हुआ था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी। विक्रमादित्य ने विक्रम संवत का आरंभ 57 ई.पू. किया था। इसके पूर्व अन्य चक्रवर्ती सम्राटों के संवत् उनके कार्यकाल को दर्शाते हैं। स्पष्ट है कि ईसा मसीह के जन्म से 57 वर्ष पूर्व चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और उनके पूर्व सम्राट अशोक सहित अनेकों चक्रवर्ती सम्राट भारत में हुए हैं।
भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका बनाने हेतु गठित कमेटी का 1957 में प्रथम निर्मित दिनदर्शिका था। यह दिनदर्शिका (कैलेंडर) शक संवत् पर आधारित है। 66 वर्ष बाद भी भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका (नेशनल कैलेंडर) शक संवत् के आधार पर ही बनाया जाता है। विगत कुछ समय से उज्जैन शहर के ज्योतिषियों, पुरोहितों, पुजारियों की मांग- भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका विक्रम संवत् पर आधारित हो। नगर उज्जैन में गत् वर्ष 22-23 अप्रैल को भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका को लेकर एक सम्मेलन भी आयोजित किया गया। देशभर के विद्वानों की राष्ट्रीय संगोष्ठी और पंचांगों की प्रदर्शनी के परिप्रेक्ष्य में नगर के ज्योतिषियों, पुजारियों, पुरोहितों ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका विक्रम संवत् पर आधारित होना चाहिए। अभी यह दिनदर्शिका शक संवत् पर आधारित है, जो कुछ ही क्षेत्रों में मान्य है। इस निमित्त उन्होंने सम्मेलन के स्थानीय आयोजक विक्रम विश्वविद्यालय और संस्कृत विश्वविद्यालय को पत्र दिया।

आयोजकों ने कहा है कि इस दिनदर्शिका को देशभर में लोग अपनाएं इसके लिए कर्टन रेजर प्रोग्राम भी किए गए हैं। राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय तिथि, वार, माह, वर्ष के निर्माण की वैज्ञानिकता पर चर्चा भी की गई।
66 वर्ष बाद तो सुधार किया जाए
ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र चतुर्वेदी ने कहा है 1949 में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में विक्रम संवत् को अंकित किया है। जबकि 1957 में "कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी" ने विक्रम संवत् के स्थान पर शक संवत् को मान्यता दी। शक संवत् हमारी गुलामी का प्रतीक है। शकों और कुशाणों ने भारत को पराजित करने की मौज में शक संवत् आरंभ किया था।
1957 में जिस भी कारण से शक संवत् को अपनाया गया, उसे अब 66 वर्ष पश्चात् सुधारा जा सकता है। देश के हर भाग में विक्रम संवत् की मान्यता है। ब्राह्मण समाज केंद्र सरकार से आग्रह करता है कि राष्ट्रीय दिनदर्शिका में सुधार कर विक्रम संवत् को अंकित किया जाए। राष्ट्रीय सम्मेलन में इस पर मंथन हुआ ? इस संबंध में केंद्र सरकार को भी पत्र भेजा गया?
ज्योतिषि बोले- उज्जैन की कालगणना आधार बने
शहर के ज्योतिषविदों व पंचांगकर्ताओं का मानना है कि कर्क रेखा में स्थित उज्जैन प्राचीन समय से कालगणना का केंद्र रहा है। उज्जैनी कालगणना सबसे शुद्ध मानी गई है। इसलिए सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् का आरंभ उज्जैन से किया था। पंचांगों, तिथि आरंभ में विक्रम संवत् को ही आधार बनाया जाता है।
प्रतिभागी ज्योतिषियों के अनुसार नगर के ज्योतिषविद् राष्ट्रीय दिनदर्शिका को लेकर हुए सम्मेलन के स्थानीय आयोजक, विक्रम विश्वविद्यालय व संस्कृत विवि के कुलपतियों से मिले तथा सभी की ओर से भिन्न-भिन्न पत्र दिए गए, जिनमें राष्ट्रीय दिनदर्शिका में विक्रम संवत् को लागू करने की मांग की गई।
अभा पुजारी महासंघ के प्रमुख पं. महेश पुजारी ने कहा कि विक्रम संवत् पूरे देश में मान्य है। केंद्र सरकार को भी इसे राष्ट्रीय दिनदर्शिका में सुधार करना चाहिए।
मेरी भी मान्यता है कि जब अंग्रेजी कलैंडर के 57 वर्ष पूर्व से सम्राट विक्रमादित्य का दिनदर्शिका को आप (भारत सरकार) ने अमान्य किया और अंग्रेजी कलैंडर के भी 78 वर्ष पश्चात् आरंभ शक् संवत् को मान्य करना, तत्कालीन "कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी" के तथा शासन की सोच के प्रति शंका उत्पन्न करता है।
स्वतंत्रता के छः दशक छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर शर्म निरपेक्षता निःसंकोच पारम्परिक हिंदू विरोध को महत्व दिया गया। यही नहीं वामपंथी एवं तथाकथित प्रगतिशीलता के नाम राष्ट्रीय सोच को दकियानूसी करार दिया गया। देश की जड़ों को खोखला करने के प्रयास ही अंग्रेजी मानसिकता के शासन तथा प्रशासन को प्रभावित करते रहे हैं।
संभव है कि तब इनसे ही प्रभावित हो कर, "कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी" ने यह निर्णय लिया हो। किन्तु अब वे सभी राष्ट्रीय झकार्य जो स्वतंत्रता पश्चात् भी धृतराष्ट्र ने छोड़ रखे थे, अब किए जा रहे हैं। वन्देमातरम्!
-तिलक रेलन वरिष्ठ पत्रकार, युगदर्पण ®2001 मीडिया समूह YDMS👑

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